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    ट्रंप के 200% टैरिफ प्लान से भारतीय फार्मा सेक्टर में हलचल, अमेरिकी बाजार पर बढ़ सकता है असर

    58 minutes ago

    युगचरण न्यूज़ | 22 जुलाई 2026

    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा आयातित जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से 200% तक टैरिफ लगाने की प्रस्तावित योजना ने भारतीय दवा उद्योग में नई चिंता पैदा कर दी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा आपूर्तिकर्ता माना जाता है और अमेरिकी बाजार भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण निर्यात गंतव्यों में से एक है। ऐसे में इस प्रस्ताव का असर केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था और वैश्विक दवा आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ सकता है।

    ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर 1 अगस्त 2026 से अगले दो वर्षों तक कोई टैरिफ नहीं लगाया जाएगा। इसके बाद अगस्त 2028 से एक वर्ष के लिए 100% टैरिफ लागू किया जाएगा और उसके बाद इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा। इस नीति का उद्देश्य दवा निर्माण को अमेरिका के भीतर बढ़ावा देना और विदेशी कंपनियों को अमेरिकी धरती पर उत्पादन इकाइयाँ स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना बताया गया है।

    ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि यह नीति अमेरिका में जेनेरिक दवा निर्माण को दोबारा स्थापित करने के लिए बनाई गई है। उनका कहना है कि जो कंपनियाँ निर्धारित समय के भीतर अमेरिका में उत्पादन संयंत्र स्थापित नहीं करेंगी, उन्हें भारी शुल्क का सामना करना पड़ेगा। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पेटेंट, ब्रांडेड और नवाचार आधारित दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।

    भारत पर कितना पड़ सकता है असर?

    भारत को लंबे समय से "दुनिया की फार्मेसी" कहा जाता है क्योंकि यहां कम लागत पर बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं का उत्पादन होता है। ये दवाएं मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर, संक्रमण और मानसिक स्वास्थ्य जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में दुनियाभर में इस्तेमाल की जाती हैं।

    उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को लगभग 9.7 अरब डॉलर की दवाओं का निर्यात किया, जो देश के कुल फार्मास्युटिकल निर्यात का लगभग 38 प्रतिशत था। ऐसे में अमेरिकी बाजार में किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर भारतीय कंपनियों की आय और निवेश योजनाओं पर पड़ सकता है।

    उद्योग ने अपनाया 'वेट एंड वॉच' रुख

    ट्रंप की इस घोषणा के बाद भारतीय दवा उद्योग ने फिलहाल सतर्क रुख अपनाया है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि अभी नीति का पूरा स्वरूप सामने नहीं आया है, इसलिए कंपनियाँ जल्दबाजी में कोई बड़ा फैसला लेने से बच रही हैं।

    उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि अब तक यह माना जा रहा था कि जेनेरिक दवाओं को टैरिफ से छूट मिलती रहेगी। इसलिए यह प्रस्ताव अप्रत्याशित माना जा रहा है। कई कंपनियाँ सरकार और अमेरिकी प्रशासन से आने वाले विस्तृत दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रही हैं।

    क्या अमेरिका में उत्पादन संभव है?

    ट्रंप की योजना का मुख्य उद्देश्य विदेशी कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन करने के लिए प्रेरित करना है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि दो वर्षों के भीतर अमेरिका में जेनेरिक दवाओं का पूरा उत्पादन तंत्र तैयार करना आसान नहीं होगा।

    दवा उद्योग के जानकारों के अनुसार केवल फैक्ट्री बनाना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन, कच्चे माल की उपलब्धता, सक्रिय औषधीय संघटक (API) की सप्लाई, नियामकीय मंजूरियाँ और व्यापक सप्लाई चेन विकसित करनी होगी। इन सभी प्रक्रियाओं में कई वर्ष लग सकते हैं।

    भारतीय कंपनियों के सामने क्या विकल्प?

    विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बड़ी भारतीय फार्मा कंपनियाँ अमेरिका में स्थानीय साझेदारों के साथ मिलकर उत्पादन शुरू करने पर विचार कर सकती हैं। वहीं कुछ कंपनियाँ उच्च लाभ वाली दवाओं का निर्माण अमेरिका में स्थानांतरित करने का विकल्प भी तलाश सकती हैं।

    दूसरी ओर कई कंपनियाँ अपनी अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम कर यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया और मध्य पूर्व जैसे अन्य बाजारों में विस्तार की रणनीति पर भी काम कर सकती हैं।

    अमेरिका के मरीजों पर भी पड़ सकता है प्रभाव

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयातित जेनेरिक दवाओं पर भारी टैरिफ लागू होता है तो अमेरिका में दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। जेनेरिक दवाएं अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ मानी जाती हैं और अधिकांश मरीज इन्हीं पर निर्भर हैं।

    कई विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि यदि आयात महंगा हुआ तो कुछ आवश्यक दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है और दवाओं की कमी या उपचार लागत में वृद्धि जैसी चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं।

    सरकार और उद्योग की नजर आगे की घोषणा पर

    फिलहाल भारतीय फार्मा कंपनियाँ और उद्योग संगठन अमेरिका की ओर से जारी होने वाले विस्तृत नियमों और दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि किन उत्पादों पर यह नीति लागू होगी, किन कंपनियों को राहत मिल सकती है और इसके क्रियान्वयन की अंतिम प्रक्रिया क्या होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में भारत और अमेरिका के बीच इस विषय पर व्यापारिक और कूटनीतिक स्तर पर भी बातचीत हो सकती है। यदि नीति वर्तमान स्वरूप में लागू होती है तो भारतीय दवा उद्योग को अपनी वैश्विक रणनीति में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।

    फिलहाल स्थिति पर सभी की नजर बनी हुई है और उद्योग ने किसी त्वरित प्रतिक्रिया के बजाय परिस्थितियों का आकलन करने की रणनीति अपनाई है। आने वाले समय में अमेरिकी प्रशासन की अंतिम अधिसूचना और व्यापारिक वार्ताएँ इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगी।

     
     
     
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