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    ध्रुवपद -धरोहर "- जयपुर घराना -विमर्श एवं प्रशिक्षण कार्यशाला" - 300 वर्ष पूर्णता की ओर अग्रसर जयपुर -

    1 hour ago

    ध्रुवपद -धरोहर "- जयपुर घराना -विमर्श एवं प्रशिक्षण कार्यशाला" - 300 वर्ष पूर्णता की ओर अग्रसर जयपुर 

     स्थापना के उत्सव का श्री गणेश शास्त्रीय संगीत के पितास्वरूप एवं जयपुर में पल्लवित - पुष्पित होने वाली सबसे पुरानी ध्रुवपद गायकी के कलाकारों द्वारा किया गया, जिसमें विश्व में जाना -माना गया जयपुर घराना पर विमर्श एवं उसकी समृद्ध धुवपद गायकी के प्रशिक्षण की कार्यशाला का आयोजन 'ध्रुवपद धरोहर ' नाम से दिनांक 29 अक्टूबर को भैरोसिंह शेखावत भवन, राजस्थान चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज में हुआ । उल्लेखनीय है कि जयपुर, राजस्थान में पल्लवित - पुष्पित हुई इस पुरातन गायकी को जयपुर सहित ग्वालियर से भी सीखने के इच्छुक आये 50 से भी अधिक युवा विद्यार्थियों ने गहरी रुचि एवं उत्साह के साथ भाग लिया ।जयपुर की स्थापना कच्छवाहा वंश के महाराजा सवाई जयसिंह जी द्वितीय द्वारा 18 नवम्बर 1725 में हई थी । उत्लेखनीय है कि स्थापना के समय से ही भारतीय साहित्य,संस्कृत, धर्म -दर्शन एवं संगीत आदि क्षेत्रों में भट्ट परिवार के साधक कलाकार पाँच पीढ़ियों से जयपुर में रहकर संस्कृत देववाणी एवं वेद वाणी कहे जाने वाले ध्रुवपद आधारित पुष्टि मार्गीय मंदिर -परम्परा हवेली संगीत के पद्य साहित्य सहित ध्रुवपद की घरानेदार शास्त्रीय संगीत की भी सेवा करते आ रहे हैं इसलिए जयपुर की ३०० वर्ष की लम्बी यात्रा को स्वयं के लिए भी विशेष गर्व एवं हर्ष का विषय समझते हुए इसे ध्रुवपद गायकी से श्री गणेश किया । नवीन पीढी को उसके समृद्ध इतिहास एवं गायन - परम्परा से जोड़ने और आगे बढ़ाने के ख़ास उद्देश्य से "भारतीय शास्त्रीय संगीत के "जयपुर - घराना पर विमर्श एवं उसकी प्रशिक्षण - कार्यशाला का आयोजन किया गया,इसे इन्टरनेशनल धुवपद धाम ट्रस्ट, जयपुर द्वारा राजस्थान चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज़, जयपुर एवं कला - संस्कृति विभाग, राजस्थान सरकार के सहयोग से आयोजित किया गया । उद्घाटन मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध उद्योगपति अध्यक्ष, राज . चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज डॉ. के एल जैन ने दीपप्रज्ज्वलन कर उद्बोधन दिया और इस अवसर पर संसाधनों के अभाव में भी बाहरी यात्राओं के साथ आजीवन जयपुर को ही समर्पित उल्लेखनीय सेवा करने वाले मुख्य प्रचारक ध्रुवपदाचार्य पद्मश्री पं ० लक्ष्मण भट्ट तैलंग और उनके परिवार की कठिन साधना एवं उसे संरक्षित -संवर्द्धित करने के उनके अथक प्रयासों को विशेष रूप से रेखांकित किया । पं० जी की पट्ट शिष्या एवं पुत्री जयपुर में ध्रुवपद गायकी की प्रबल - संवाहक विदुषी डॉ मधु भट्ट तैलंग के निर्देशन में लगातार 3 घंटे तक ध्रुवपद की स्वर - -सरिता बहती रही । विमर्श और ध्रुवपद -प्रशिक्षण के पहले चरण में डॉ० मधु ने ध्रुवपद की दो धाराओं के अन्तर्गत जयपुर में स्थापना के समय से ही जयपुर महाराजाओं द्वारा देश के कोने - कोने विशेषकर .दक्षिण से अश्वमेध यज्ञ एवं धार्मिक अनुष्ठान आदिके लिए बुलाये गये भट्ट घराने के वेल्लनाटीय पंडितों एवं संगीत -साधकों ,जिससे डॉ मधु के पूर्वजों और स्वयं का भी संबंध है,उनके मंदिरपरम्परागत धर्म,संस्कृत एवं मंदिर -परम्परा केअन्तर्गत हवेली संगीत -साधना एवं रुक्मणी मंगल आदि गायनपरम्परा पर प्रकाश डाला एवं महाराजाओं की शैव एवं कृष्णभक्ति और उनके सम्प्रदायों के अंतर्गत उनकी आस्था, दीक्षा एवं उनके संरक्षण पर प्रकाश डाला । मंदिर - परम्परा के पंडित एवं गायक महाराजा के धर्म - गुरू के रूप में रहे एवं प्रचार से दूर सिर्फ प्रभु - भक्ति में लीन रहे,दूसरी ओर जयपुर दरबार में महाराजाओं द्वारा स्थापित छतीस कारखानों में से एक गुणीजन खाने में महाराजाओं द्वारा देश के कोने -कोने से पंडित उस्ताद बुलाकर संरक्षण दिया गया एवं भारतीय शास्रीय संगीत के गुणग्राही राजाओं द्वारा उन्हें गुरू के रूप में सम्मान दिया । इस अवसर पर जयपुर में मूल .रूप से अंबैठा सहारनपुर में जन्में उस्ताद बहराम खां को जयपुर महाराजा रामसिंह जी द्वारा संरक्षण दिया गया एवं उन्होंने जयपुर में दरबारी संरक्षण के बाद डागर घराने की नींव डाली । डागर घराने के वंशज उस्तादों की उल्लेखनीय साधना और प्रचार -प्रसार,जिसने जयपुर के ध्रुवपद को वैश्विक पहचान दी,पर प्रकाश डाला और कहा कि यदि इस घराने को राजदरबार या सरकार का सतत् संरक्षण मिलता रहता या स्कूलों - कॉलेजों में संगीत की दक्षता को अकादमिक डिग्रियों से ज़्यादा महत्व दिया जाता तो ये हुनरमन्द घराने के उस्ताद कई वर्षों पूर्व जयपुर छोड़कर नहीं जाते । डॉ मधु ने गायन के अन्य मनरंग के ख्याल के जयपुर घराने,पखावज के रूपराम घराना, सितार का सोनिया एवं कत्थक के जयपुर घराने पर भी संक्षिप्त प्रकाश डाला । डॉ. मधु ने बताया कि 19 वीं शताब्दी तक लोग ध्रुवपद में पुराने हरिदास,तानसेन, अष्टछाप अदि कवियों की रचनाएं . ही ध्रुवपद में गाते आये ।जयपुर राजस्थान के मेरे पिता गुरू ने अपनी पीढ़ी में सर्व प्रथम ने इस परम्परा को आगे बढ़ाते हुए धुवपद धमार बनाये और दो बार वाराणसी में रचनाओं के लिए तुलसी पुरस्कार भी मिला ।डॉ . मधु ने अपने को सौभाग्य शाली समझते हुए अपने पिता -गुरू द्वारा ध्रुवपद की मंदिर एवं डागर घराने और इन नवाचारों की प्राप्त शिक्षा को प्रसाद माना। मधु ने जयपुर के ध्रुवपद से संबद्ध बीनकार घराने एवं पखावज -परम्परा पर भी प्रकाश डाला। दूसरे चरण में डॉ. मधु भट्ट तैलंग ने राग वृन्दावनी सारंग में डागर घराने की आलापचारी की विविध गायकी - विशेषणों के साथ कार्यशाला में विलंबित,जोड़ से लेकर झाले तक के आलापों का प्रशिक्षण एवं गायन कराया । डागर घराने के सूलताल में निबद्ध तानसेन रचित अकबर की प्रशंसा में रचित ध्रुवपद 'तुम रब तुम साहेब ' को चारों चरणों स्थाई, अन्तरा, संचारी एवं आभोग स्चनाकार की छाप सहित उसमें लयकारियों के विस्तार को भी सिखाया एवं इसी राग में चौताल में निबद्ध हवेली संगीत कीमंदिर परम्परा के छः सौ वर्ष पूर्व की महाप्रभु वल्लभाचार्य की चारों चरणों में ही कृष्ण -भक्ति परक अष्टयाम सेवा में राजभोग में गाई जाने वाली ध्रुवपद रचना " बैठे हरि राधा संग एवं उसकी गायकी का ताला त्मक स्वरूप भी बताया । डॉ मधु ने स्वरों को वैदिक पद्वति, थाट पद्धति, घरानों की जनक राजस्थान में ही पनपी चारों वाणियों और उसकाआधार भरतकालीन पंच गीतियों और ध्रुवपद साधने के अलंकारों, गमक, मींड, कण, श्रुति गायन -ढंग भी बताया ।मधु ने ख्याल के मनरंग द्वारा गायन के ख्याल घराने पर भी संक्षिप्त प्रकाश डाला।ध्रुवपद की तालों को भी हाथ से लगाने केखेल आदि भी बताये । कार्यशाला में परवावज पर आमेर जयपुर के रूपराम घराने के पखावज- वादक प्रतीश रावत संगत ने की। कार्यशाला का सहसंयोजन डॉ . प्रदीप टांक ने किया । जयपुर की ध्रुवपद की इस समृद्ध परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से आयोजित इस कार्यशाला में भाग लेने वाले प्रशिक्षणार्थियों का पंजीकरण पूर्णतः निःशुल्क रहा । समापन समारोह में अध्यक्षता कररहे विख्यात वैदिक चित्रकार रामूरामदेव ने इसे सीखने वालों के लिए उपयोगी बताते हुए जयपुर की ध्रुवपद -परम्परा के संरक्षण -संवर्द्धन में ट्रस्ट के सतत् प्रयासों की सराहना कर विद्यार्थियों को इसे भविष्य में साधने हेतु प्रेरित किया एवं प्रमाण पत्र द्वारा सम्मानित किया । मंच- संचालन योगाचार्य डॉ नरेन्द्र शर्मा ने किया ।

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