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    सुंदरकांड केवल पारंपरिक पाठ नहीं - आचार्य ईश्वरानंदा

    52 minutes ago

    अपार संपन्नता पर मन अशांत क्यों? गीता और सुंदरकांड में है समाधान

    जयपुर - जयपुर की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरा एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक वैचारिक क्रांति की गवाह बनी। वेद विद्या ट्रस्ट दिल्ली के तत्वावधान में बनीपार्क स्थित “श्री जंगलेश्वर महादेव मंदिर” में एक दिवसीय सुंदरकांड ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया गया। सुंदरकांड - एक तार्किक विश्लेषण ज्ञान यज्ञ का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ।

    कार्यक्रम के मुख्य वक्ता “आर्ष विद्या मंदिर दिल्ली के परम पूज्य ब्रह्मलीन स्वामी प्रबुद्धानंद जी” की महान वेदांत परंपरा के संवाहक आचार्य ईश्वरानंदा ने सुंदरकांड के माध्यम से जीवन-प्रबंधन के उन व्यावहारिक सूत्रों को बताया, जिनका सीधा संबंध भगवान श्री कृष्ण द्वारा भगवद्गीता में दिए गए निष्काम कर्म के सिद्धांतों से है। इस मौके पर

    समाजसेवी एच सी गणेशिया, योगाचार्य मनीष योगी और शकुन ग्रुप से जे डी महेश्वरी सहित शहर के गणमान्य लोग मौजूद रहे।

    इस मौके पर आचार्य ईश्वरानंदा ने बताया कि यह आयोजन आज के इस आधुनिक युग में मनुष्य के पास भौतिक साधन, उच्च पद, ऐश्वर्य और अपार धन-संपत्ति तो है, लेकिन फिर भी एक गहरा खालीपन और असंतुष्टि बनी रहती। सुंदरकांड में हनुमान जी ने विपत्ति की एक नई और वैज्ञानिक परिभाषा दी है सच्ची विपत्ति धन या स्वास्थ्य की हानि नहीं है, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप (ईश्वर) का विस्मरण है।

    भगवदगीता के ज्ञान को जोड़ते हुए इस सत्र में बताया गया कि कैसे भक्ति हमारे अंतःकरण को कोमल और शुद्ध बनाती है, और कैसे वेदांत का ज्ञान हमें पूर्ण मोक्ष की ओर ले जाता है। लंका दहन की घटना को यहाँ एक नए रूप में प्रस्तुत किया गया, जहाँ हनुमान जी द्वारा लगाई गई आग वास्तव में ज्ञान की अग्नि है, जो हमारे भीतर की अज्ञान रूपी लंका को भस्म कर देती है।

    कहानियों से परे आपके भीतर की आंतरिक रामायण

    आचार्य ईश्वरानंदा महाराज की अनूठी व्याख्या शैली में रामायण केवल एक ऐतिहासिक महाकाव्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले मानसिक और मनोवैज्ञानिक द्वंद्व का सजीव नक्शा है। आचार्य के अनुसार प्रभु श्री राम किसी कहानी के सामान्य पात्र नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के भीतर निवास करने वाली साक्षी चेतना (परमात्मा “स्व”) हैं।

    माता सीता वे हमारी आत्मा (अपने को परमात्मा से माया वश अलग मानने वाली) का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो सांसारिक मोह-माया और अज्ञान की अशोक वाटिका में घिरी हैं।

    हनुमान जी वे उस आदर्श अनुशासित मन और साधक के प्रतीक हैं, जिनकी प्राण शक्ति और संकल्प को ‘शुद्ध विवेक बुद्धि’ (बुद्धि) का मार्गदर्शन प्राप्त है।

    रावण दस सिर वाला रावण दरअसल हमारा अहंकार, क्रोध और वासना है, जो हर पल हमारी मानसिक शांति का अपहरण कर लेता है।

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